राजतिलक जुलाई 24, 2009 लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप तकलीफ तो हुई ...लेकिन और चारा ही क्या था ? अगरयह तय है कि हम दोनों में कोई एक ही खुश रह सकता है तो सोचने की गुंजाईश ही नहीं , आओ संभालो अपनी राजगद्दी मैंने करवा दी है मुनादी तुम्हारे राजतिलक की। - रवीन्द्र टिप्पणियाँ संगीता पुरी 24 जुलाई 2009 को 3:16 am बजेबहुत बढिया .. ऐसा ही होता है !!जवाब देंहटाएंउत्तरजवाब देंUdan Tashtari24 जुलाई 2009 को 4:10 am बजेवाह!! क्या प्रेम समर्पण के भाव हैं..बहुत खूब!!जवाब देंहटाएंउत्तरजवाब देंटिप्पणी जोड़ेंज़्यादा लोड करें... एक टिप्पणी भेजें
बहुत बढिया .. ऐसा ही होता है !!
जवाब देंहटाएंवाह!! क्या प्रेम समर्पण के भाव हैं..बहुत खूब!!
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